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Showing posts from August, 2018
मुझसे दूर तुम चली तो गयी थी लेकिन, कुछ भी भुला ना पाया था मैं, तुम्हारी याद में, तुम्हे ढूंढ़ता हुआ , फिर एक बार उन गलियों में आज आया था मैं लेकिन ना तुम मिले, ना मिले 'हम' वहां बस एक सन्नाटा सा था, उस भीड़ में , जहाँ कभी हाथ थामे चले थे हम, धूल की एक चादर थी,कोई निशान भी न मिले.. याद है वो नाव , और पुरे चाँद के निचे हम कुछ डरे डरे से ,छुपे छुपे से हम , पानी में भटकती वो चुप चाप सी नाव, आज किनारे रखी थी, उदास ज़्यादा, इंतज़ार में कम की कोई उसे फिरसे ले जाए उन लहरों में, लेकिन अब वो चाँद कहाँ, ना ही थी वो हवा एक तूफ़ान सा उठा है, काले बादल हैं हर जगह इस पुरे हलाहल में,बस वो नाव ही है एक,हमारा गवाह शायद अब वो समय आकर भी नहीं आ पायेगा ना तुम , तुम रहे, ना मैं , मैं रह पाउँगा  .. पता नहीं ऐसा कैसे हो गया.. और क्यों, पर सब भुलाकर भी,मैं कुछ भूल ना पाउँगा  ..